अंतस की मधुर गूॅंज

गीत — पूर्णिमा सुमन

अंतस की मधुर गूँज

मुखड़ा
मोद-मंजुल अंतरा में, चेतना पुलकित हुई,
राग नूतन फूट निकला, भावना सब मुक्त हुई।
रश्मि सा कोई अचानक, प्राण-आँगन में तुला,
ध्वस्त यामिनी तिमिर की, भोर अनुपम है खिली।
अंतरा — 1
कोश कोरे पत्र का जो, प्रेम-गाथा लिख रहा,
छाँह भीगी पक्षियों की, रंग नूतन भर रहा।
मौन के स्पंदन मुखर अब, शब्द के ही बिन यहाँ,
तार वीणा के छुए जो, वेदना झंकृत चली।
अंतरा — 2
साँझ की वेला ढली जब, मन-शिखा पावन हुई,
याद की सुगंधित हवा से, अंतरा पुलकित हुई।
धड़कनों ने लिख दिया है, नेह का सुंदर कथ्य,
द्वार सूने पर अचानक, नेह की नव-किरण मिली।
अंतरा — 3
चेतना हर मोड़ पर अब, घुल रही स्वर तरंग,
हर्ष-पुलकित हो उठी है, सृष्टि के सब दिव्य रंग।
नेह की वेला खिली जो, खिल उठे अंतस-सुमन,
बात मधुरिम प्रेम सुर में, विरहिण यामिनी ढली।

पूर्णिमा सुमन

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