गज़ल़

कविता — पूर्णिमा सुमन

दिल में हर पल ही नफ़ासत हो ज़रूरी तो नहीं,
हर नज़र में ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं।

प्यार का दरिया सभी को ही मयस्सर कब है,
हर किसी की वही क़िस्मत हो ज़रूरी तो नहीं।

दूर रहकर भी कई लोग क़रीब आते हैं,
पास रहने से ही क़ुरबत हो ज़रूरी तो नहीं।

जिसको चाहो वही समझे ये तमन्ना कैसी,
हर किसी को ही इजाज़त हो ज़रूरी तो नहीं।

दिल के रिश्तों में भरोसा भी बहुत होता है,
ख़ानदानी ही विरासत हो ज़रूरी तो नहीं।

ज़िंदगी दर्द भी देती है सलीक़े के साथ,
हर खुशी बिन किसी कीमत हो ज़रूरी तो नहीं।

ऐसे अहसास 'सुमन' खुद ही सँभाले रखना,
हर किसी पर ही इनायत हो ज़रूरी तो नहीं।

-सुमन

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