गाँव की याद

कविता — पूर्णिमा सुमन

गाँव की याद
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वह गाँव की पगडंडी, वह पीपल की छाँव,
वह मिट्टी की खुशबू, वह अपना-सा गाँव।
वह आँगन में तुलसी, वह चूल्हे की आँच,
वह मिट्टी के बर्तन, वह रिश्तों की साँच।

वह पोखर का पानी, वह अमराई की डाल,
वह सावन की बूँदें, वह झूले कमाल।
न कोई दिखावा था, न रिश्तों में दीवार,
छोटी-छोटी खुशियों में बसता था संसार।

वह चौपाल की बातें, वह अपनों का प्यार,
वह सुख-दुःख में साथी, वह स्नेह अपार।
न दौलत की चाहत थी, न ऊँचा अभिमान,
रिश्तों की मिठास ही थी जीवन की शान।

गाँव नहीं छूटता है मन से, चाहे दूर ठिकाना हो,
यादों में अब भी बसा वही गलियारा पुराना हो।
शहरों की चकाचौंध भले ही मन को खूब लुभाए,
गाँव की माटी का स्नेह भला कैसे बिसराए।

-सुमन

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