मन का दर्पण

कविता — पूर्णिमा सुमन

मेरे मन की हर धड़कन का, मधुर सुरीला स्पंदन है,
शब्द नहीं बस भाव-दीप का, उज्ज्वल पावन वंदन है।
जब भी अंतर व्यथा कहे कुछ, कलम स्वयं चल पड़ती है,
मेरे लिए कविता केवल, मेरे मन का दर्पण है॥

सुख के स्वर्णिम रंग सजाती, दुःख की पीड़ा गाती है,
आशाओं के नव अंकुर को, उर-आँगन महकाती है।
जो अधरों तक आ न सके वह, कागज़ पर मुस्काता है,
भावों की सरिता का निर्मल, यह अविरल उद्गम-क्षण है॥

जीवन-पथ के शूल समेटे, फूलों का अहसास लिए,
बीते कल की स्मृतियों संग, आने वाले श्वास लिए।
अंतरतम की मौन व्यथा को, स्वर देना इसका कर्म,
मेरे लिए कविता केवल, शब्द नहीं जीवन-धन है॥

जब-जब मन के नभ पर छाए, संशय के काले बादल,
कविता बनकर दीप जलाए, करती पथ को फिर उज्ज्वल।
'सुमन' हृदय के कोमल भावों की, है ये अनुपम धारा,
शब्द-शब्द जिसमें भावना का, सुंदर एक अर्पण है।

पूर्णिमा सुमन की और रचनाएँ

सभी रचनाएँ — बोलती कलम