बाल-बाल बची माँ

कविता — ज्योति बरनवाल

बाल-बाल बची माँ

अचानक रात के करीब दस बजे फोन आया।

उधर से मेरी बेटी की घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी—

“माँ… बाल-बाल बची माँ! पता नहीं अभी क्या हो सकता था… बहुत बड़ी घटना हो सकती थी।”

उसकी आवाज़ में डर साफ़ महसूस हो रहा था। मैंने घबराकर पूछा—

“क्या हुआ बिटिया? ठीक से बता, हुआ क्या है?”

वह बोली—

“माँ, कुकर फट गया है। बहुत ज़ोर से ब्लास्ट हुआ। मेरी रूममेट हैं न, उसी दीदी का कुकर था। दाल और दाल का पानी इतनी तेज़ी से उछला कि पूरी दीवार गंदी हो गई। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि आसपास रहने वाले सभी लोग जमा हो गए।”

मैंने पूछा—

“लेकिन ऐसा हुआ कैसे? कुकर कंपनी का खराब तो नहीं था?”

बेटी बोली—

“पता नहीं माँ, शायद कुकर के ढक्कन की ठीक से सफाई नहीं हुई थी। उसका छेद बंद हो गया होगा। उसी वजह से अंदर का दबाव बढ़ गया और कुकर फट गया।”

फिर अचानक उसने कहा—

“माँ, उसके बाद तो सब मेरा कुकर देखने लगे।”

मैंने पूछा—
“क्यों?”

वह बोली—

“मेरा कुकर देखकर सब कहने लगे कि तुम्हारा कुकर तो हॉकिन्स का है और एकदम साफ है। फिर बोले कि बेटा, कुकर में खाना बनाते समय बहुत सावधानी रखनी चाहिए। पानी पर्याप्त है या नहीं, कुकर का ढक्कन और उसकी सीटी वाला रास्ता साफ है या नहीं—इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए।”

तभी उसकी रूममेट दीदी ने कहा—

“हम तो उस समय वहाँ थे ही नहीं। अपने कमरे में आकर चावल बीन रहे थे। नहीं तो आज तो मेरा स्वाहा हो जाता!”

मेरी बेटी ने तुरंत कहा—

“कैसी बात कर रही हैं दीदी! आप वहाँ नहीं थीं, पर हम वहाँ जा ही रहे थे फ्रिज से पानी लेने के लिए, लेकिन पता नहीं क्यों मन ने कहा कि थोड़ी देर रुक जाते हैं। अपना होमवर्क थोड़ा और पूरा कर लेते हैं ।”

इतना सुनकर मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई।

मन बार-बार उसी घटना के बारे में सोचने लगा।

कितना बड़ा संयोग था!

जिस जगह मैं जाने वाली थीं, वहीं कुछ देर बाद इतना बड़ा हादसा हो गया। अगर उस समय मैं वहाँ होतीं तो क्या होता—यह सोचकर ही मन काँप उठता है।

कभी-कभी जिंदगी हमें बिना बताए किसी अनहोनी से दूर कर देती है।
हम समझ भी नहीं पाते कि किसी जगह जाने का मन क्यों बदल गया, किसी काम में थोड़ी देर क्यों हुई या अचानक कोई दूसरा काम क्यों याद आ गया।

शायद हर बार इसे संयोग कह देना भी ठीक नहीं।

उस रात कुकर के फटने की आवाज़ तो कुछ देर बाद शांत हो गई, दीवार पर लगी दाल भी साफ हो जाएगी , लोग अपने-अपने कमरों में लौट गए…

लेकिन उस घटना की गूँज अभी तक बिटिया कानों में सुनाई दे रही है।

एक छोटी-सी लापरवाही कितनी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है, यह उस रात सबने अपनी आँखों से देखा।

दूसरे की एक लापरवाही से पूरी बिल्डिंग की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

इसलिए रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों को लेकर थोड़ी-सी सावधानी भी बहुत जरूरी है।

और उस रात माँ होने के नाते मेरे मन में बस एक ही बात थी—

“हे भगवान! मेरी बच्ची को आपने बाल-बाल बचा लिया… इसके लिए आपका लाख-लाख शुक्र है।”

कवयित्री ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)

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