स्वदेश की मिट्टी
कविता — राघव सचिन
स्वदेश की मिट्टी , मुझको जान से प्यारी हैं।
इसकी खुशबू सारे , जगत से ही न्यारी है।
इसको मैं नित करूं प्रणाम ,तिलक लगाऊँ
कितने वीरों ने , इस मिट्टी पर जान वारी हैं।
बहुत ही कृपा कर दी रब ने,इस मिट्टी में दिया जन्म।
मैं हूं न्योछावर मिट्टी पर, करूं इसे नित नित नमन।
मुझे धन की है क्या ज़रूरत,मिट्टी हैं मेरा स्वाभिमान।
इस पर ही मैं जाऊं मिट , इसमें ही हो मेरा मरण।
इसकी कारण हैं जीवित, ख़ुश क़िस्मत हम सारे।
अपना घर , हम स्वयं,और भारत, टीका हैं इसके सहारे।
इसका तुम सम्मान करो,इसका तुम गुणगान करो।
वजह से इसकी आज प्राण, सलामत हैं मेरे तुम्हारे।
इसकी खुशबू सारे , जगत से ही न्यारी है।
इसको मैं नित करूं प्रणाम ,तिलक लगाऊँ
कितने वीरों ने , इस मिट्टी पर जान वारी हैं।
बहुत ही कृपा कर दी रब ने,इस मिट्टी में दिया जन्म।
मैं हूं न्योछावर मिट्टी पर, करूं इसे नित नित नमन।
मुझे धन की है क्या ज़रूरत,मिट्टी हैं मेरा स्वाभिमान।
इस पर ही मैं जाऊं मिट , इसमें ही हो मेरा मरण।
इसकी कारण हैं जीवित, ख़ुश क़िस्मत हम सारे।
अपना घर , हम स्वयं,और भारत, टीका हैं इसके सहारे।
इसका तुम सम्मान करो,इसका तुम गुणगान करो।
वजह से इसकी आज प्राण, सलामत हैं मेरे तुम्हारे।