खिड़की पर ठहरी शाम

कविता — राघव सचिन

मुद्दतों बाद आज ,
खिड़की पर ठहरी शाम।

इस पर मुझको याद आए
बस तेरा ही नाम।

कभी हम दोनों ,
खिड़की से झांकते थे

खिड़की का वो आलम
ही , था अपना मुकाम।

वो भी कोई दौर था,
वो भी कोई शाम थी।

दिल,घर,खिड़की,और ये
धड़कन,बस तेरे ही नाम थी।

अब न जाने कहां गए
तुम, तन्हाई में छोड़कर।

तुम जो थे साथ में,
पास खुशियां तमाम थी।

खिड़की पर ठहरी शाम
मुझे तेरी याद दिलाती हैं।

आंखे मेरी दरिया होकर
बस तुझी को बुलाती हैं।

तुम न जाने गए किधर
मुझको रोता छोड़कर

तेरी यादें शामो - सहर
मुझको बड़ा सताती हैं।

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