मैं कैसा हूं
कविता — राघव सचिन
मैं कैसा हूं , ये बस मैं जानता हूं।
मैं मतलबियों का , नहीं कहना मानता हूं।
मैं अगर जो करूं बुरा , मेरा भी हो जाए
मैं तो बस मेहनत और कर्मों में मानता हूं।
कोई मेरे बारे में, चाहे सोचे बुरा।
सोचने वाला ही है , शख्स अधूरा।
मैं तो रब की राहों पर, चलता जाता हूं
मुझ में है मानवता, मैं शख्श हूं पूरा।
मैंने अपने ज्ञान से, पाई पाक नज़र।
कुछ लोगों को अपने ही, मन की नहीं ख़बर
जहां हो पैसा , ये चले जाते है वहां....
जहां सच्चाई और मेहनत हो,जाते नहीं उधर
मेरी छवि में साफ छलकती, देखो सच्चाई।
झूठे लोग ही करते हैं , मेरी रुस्वाई ।
सच्चे लोगों ने ही तो , दुनिया हैं पाई।
मंज़िल उसकी ही होती,जो है सच्चा राही।
मैं मतलबियों का , नहीं कहना मानता हूं।
मैं अगर जो करूं बुरा , मेरा भी हो जाए
मैं तो बस मेहनत और कर्मों में मानता हूं।
कोई मेरे बारे में, चाहे सोचे बुरा।
सोचने वाला ही है , शख्स अधूरा।
मैं तो रब की राहों पर, चलता जाता हूं
मुझ में है मानवता, मैं शख्श हूं पूरा।
मैंने अपने ज्ञान से, पाई पाक नज़र।
कुछ लोगों को अपने ही, मन की नहीं ख़बर
जहां हो पैसा , ये चले जाते है वहां....
जहां सच्चाई और मेहनत हो,जाते नहीं उधर
मेरी छवि में साफ छलकती, देखो सच्चाई।
झूठे लोग ही करते हैं , मेरी रुस्वाई ।
सच्चे लोगों ने ही तो , दुनिया हैं पाई।
मंज़िल उसकी ही होती,जो है सच्चा राही।