भोर अलबेली

कविता — डॉ कुसुम रानी सिंघल

जागो उठकर आलस त्यागो,
नीले आसमान को ताको,
आई आई आई भोर,
प्यारी अलबेली सी भोर।

सूरज से पहले आ जाती ,
मुसकाती सी प्यारी प्यारी ,
पूरब दिशि को खूब सजाती,
सोने सी आभा बिखराती ,
जो देखे उसको भरमाती,
ऐसी अलबेली सी भोर।
आई आई आई भोर।

पत्ते पत्ते को रंग देती ,
कलियों को नव जीवन देती ,
चिड़ियों को देखो,चहचहातीं,
लगता कोई गीत सुनाती,
मस्त पवन बहती चहुँओर ।
ऐसी अलबेली सी भोर ।
आई आई आई भोर ।

अंधकार को दूर भगाती,
सबके मन में आस जगाती ,
जड़ चेतन सबको हरषाती,
धीरे से मानो कह जाती,
कर्म की पकडो अपनी डोर।
आई आई आई भोर ।
अलबेली सी प्यारी भोर।

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