प्रेम की पाती

गीत — डॉ कुसुम रानी सिंघल

ऊधौ पाती श्याम कू ,दीजो कह समझाय
।
ब्रजमण्डल ब्रजराज बिनु ,नैकु न जिय को भाय।

राधे प्रेम की पाती दीन्ही।
नयनन ते असुअनि की धारा,
पाती गीली कीन्ही ।

जब ते श्याम गए गोकुल ते,
सुधि नेकउ नहीं लीन्ही ।

मैया बाबा बिकल विह्वल हैं,
नैकु न परवाह कीन्ही ।

जा मारग ते गए प्राण-प्रिय ,
देखि-देखि थक लीन्ही ।

दिन नही चैन , रात नहीं निंदिया ,
घर - द्वारे तज दीन्ही ।

आँसू सूख गए नैनन के,
पथरीली सी कीन्ही ।
राधे प्रेम की पाती दीन्ही ।

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