बन पतंग सा उड़ना है (बाल कविता)
कविता — डॉ कुसुम रानी सिंघल
माँ मुझको भी बन पतंग सा
नील गगन में उडना है ।
अंबर में जो तैर रहे हैं,
सब मेघों से मिलना है ।
कैसे यह काला हो जाता ?
कभी-कभी धुंधला सा लगता।
इंद्रधनुष कैसे बन जाता?
सारे राज समझना है।
चंदा मामा के घर जाना।
कुछ दिन वहाँ रहकर भी आना।
शीतलता का गजब ख़ज़ाना,
कुछ-कुछ लेकर आना है।
माँ,तुम सब कुछ कर सकती,
तुझमें तो जादू की शक्ति।
पंख लगा दो मुझे उड़ा दो,
करो न कोई बहाना है।
तुम कहती हो परी तुम्हारी,
आसमान से उतरी आई।
फिर से वापस जाना है।
उडकर सारे आसमान का,
चक्कर मुझे लगाना है ।
नील गगन में उडना है ।
अंबर में जो तैर रहे हैं,
सब मेघों से मिलना है ।
कैसे यह काला हो जाता ?
कभी-कभी धुंधला सा लगता।
इंद्रधनुष कैसे बन जाता?
सारे राज समझना है।
चंदा मामा के घर जाना।
कुछ दिन वहाँ रहकर भी आना।
शीतलता का गजब ख़ज़ाना,
कुछ-कुछ लेकर आना है।
माँ,तुम सब कुछ कर सकती,
तुझमें तो जादू की शक्ति।
पंख लगा दो मुझे उड़ा दो,
करो न कोई बहाना है।
तुम कहती हो परी तुम्हारी,
आसमान से उतरी आई।
फिर से वापस जाना है।
उडकर सारे आसमान का,
चक्कर मुझे लगाना है ।