चाँद की आत्मकथा

कविता — सोहन सानप

मैं हूँ चाँद, मेरे बारे में क्या कहते हैं, ये तो सब जानें, मैं प्रेम-विचार का प्रतीक हूँ।

मैं सौंदर्य, प्रतिभाशाली एक ग्रह, एक और बालकों का मामा मुझे कहलाया जाता है। मेरे बारे जो कहे, वो विज्ञान और आध्यात्मिकता दोनों ही मेरा विषय है। सुंदर ग्रह सोम, शीतल प्रखरित तारा से जाना जाता हूँ।

आज पृथ्वीवासी मेरी भूमि में आना चाहते हैं, मेरी मिट्टी के बारे में खोज हेतु। मैं अत्यंत शांत, दयालु स्वभावी हूँ।

सिर्फ कुछ कहना चाहता हूँ, क्या मैं एक बाल-शिशु का मामा हूँ? पर आज हर माता इसी तरह से शिशु को सहलाती है। चाँद सिर्फ एक दिखावा और एक ग्रह नहीं, तो पृथ्वी का जीवन है।

मेरी भूमि पर जो गड्ढे हैं, उसे काले दाग कहते हैं। इस घटना पर बहुत-सी लोककथाएँ हैं। पर मेरे विचार से मेरे सौंदर्य पर किसी की नीची दृष्टि न लगे, इसीलिए वे काले-से धब्बे हैं।

मेरा महत्व पृथ्वी पर शरद पूर्णिमा के दिन अधिक है। मैं इंसान के विचारों की शीतलता और सहनशीलता का प्रतीक हूँ। स्वयं शिव की जटाओं की शोभा हूँ।

मैं सिर्फ रात में दिखता हूँ, पर असल में जो मेरा तेज है, वह मेरा नहीं। मैं सूर्य के तेज से चमकता हूँ। पर सूर्य की भीषण उष्ण लहरों को शीतल ठंड में परिवर्तित करता हूँ।

और पृथ्वी की शिशिर ऋतु में मेरा काल अधिक मात्रा में होता है।

मैं चाँद, दूध-सा सफेद, शुभ्र, तेजस्वी हूँ। पर कभी एक ख़याल आता है कि अगर मैं न होता, तो आज पृथ्वी पर जीव-सृष्टि नहीं होती।

मैं चाँद हूँ, सबसे विशाल सितारा।

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