जीवन को अर्थ दो

कविता — सोहन सानप

मन बड़ा विक्षिप्त है,
उसकी गति की सीमा नहीं।
उसे एकांत नहीं।
उसपे नियंत्रण कर लो,
जीवन को अर्थ दो।

कितने महंत विद्वान हुए,
अहंकार को रोका नहीं।
अहंकार बड़ा विक्षिप्त है,
अहंकार में जीवन मिट्टी हो जाएगी।
उसे अपने से दूर रखो,
जीवन को अर्थ दो।

कितने धनवान हो गए,
लोभ को रोका नहीं।
लोभ बड़ा विक्षिप्त है,
लोभ में सब खो दिए।
उससे दूर भागो तो,
जीवन को अर्थ दो।

कितने महान हुए,
ईर्ष्या को रोक न पाए।
ईर्ष्या बड़ी विक्षिप्त है,
उसे होने ही न दो,
जीवन को अर्थ दो।

कितनी कोशिश की,
इच्छा तो रुकी नहीं।
ये इच्छा बड़ी विक्षिप्त है,
एक दिन संसार खा लेगी।
उसे तुम दूर तो करो,
जीवन को अर्थ दो।

कितना भी प्रयास किया,
क्रोध तो रुका नहीं।
क्रोध बड़ा विक्षिप्त है,
जीवन अपना जला देगा।
उससे तुम रोको तो,
जीवन को अर्थ दो।

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