जिस दिन शब्दों ने विद्रोह किया
कविता — सोहन सानप
जिस दिन शब्दों ने विद्रोह किया,
इंसान साँस लेते खत्म हो गया।
पटाखे की तरह फूटने लगा,
आह! दोनों ने उसे बर्बाद कर दिया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
अभिमान के शब्द बाहर निकले,
भले धनवान गरीब बन गया।
अभिमान अपने आप चूर हो गया,
हँसता हुआ मुखड़ा रोने लगा।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
प्रेम वाणी भूल गया,
अंधकार जीवन में आ गया।
पैर आसमान को छू गया,
हँसता हुआ मुखड़ा उदास हो गया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
वाणी पर अगर नियंत्रण न रह पाया,
राजा भी रंक हो गया।
एक खिला हुआ फूल रह न पाया,
खुशियों वाले चेहरे का रंग बदला।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
कोमल सी चीख आक्रोशी हुई,
जब वाणी उल्टी-पलटी खा गई।
मीठी वाणी समझ न आई,
तब स्वर्ण लोहा बन गया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
इंसान साँस लेते खत्म हो गया।
पटाखे की तरह फूटने लगा,
आह! दोनों ने उसे बर्बाद कर दिया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
अभिमान के शब्द बाहर निकले,
भले धनवान गरीब बन गया।
अभिमान अपने आप चूर हो गया,
हँसता हुआ मुखड़ा रोने लगा।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
प्रेम वाणी भूल गया,
अंधकार जीवन में आ गया।
पैर आसमान को छू गया,
हँसता हुआ मुखड़ा उदास हो गया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
वाणी पर अगर नियंत्रण न रह पाया,
राजा भी रंक हो गया।
एक खिला हुआ फूल रह न पाया,
खुशियों वाले चेहरे का रंग बदला।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।
कोमल सी चीख आक्रोशी हुई,
जब वाणी उल्टी-पलटी खा गई।
मीठी वाणी समझ न आई,
तब स्वर्ण लोहा बन गया।
जब शब्दों ने विद्रोह किया।