प्रकृति का दिया न बुझाओ
कविता — सोहन सानप
प्रकृति है अनमोल उपहार
रहती है सदा बहार
इसका दिया बुझ रहा
तो ये संसार नहीं रहा
प्रकृति है अनमोल उपहार
उपहार की दुर्गति न करो बार-बार
उपहार है आशीर्वाद
उसका लो आनंद बार-बार
पर उसकी अगर हो अवहेलना
तो कोई सह न पाएगा झेलना
उपहार है आशीर्वाद
करती है प्रेम-वर्षा
उदार जीवन उसका हो सत्कार
प्रकृति का दिया न बुझाओ
अपना जीवन खुद बचाओ
ये बाँध लो गाँठ
प्रकृति की न करो अवहेलना
कोई उसे न झेल पाएगा
सूर्य चंद्र वृक्ष मेघ
प्रकृति के सूचना-चालक
इनका संकेत न ठुकराओ
प्रकृति का दिया न बुझाओ
प्रकृति का दिया
कभी न बुझे
कोई उसकी दुर्गति न करो
प्रकृति का विरोध न करो
प्राण, श्वास, न उदर-भरण
कुछ नहीं रह पाएगा
अगर प्रकृति का दिया बुझ जाएगा
रहती है सदा बहार
इसका दिया बुझ रहा
तो ये संसार नहीं रहा
प्रकृति है अनमोल उपहार
उपहार की दुर्गति न करो बार-बार
उपहार है आशीर्वाद
उसका लो आनंद बार-बार
पर उसकी अगर हो अवहेलना
तो कोई सह न पाएगा झेलना
उपहार है आशीर्वाद
करती है प्रेम-वर्षा
उदार जीवन उसका हो सत्कार
प्रकृति का दिया न बुझाओ
अपना जीवन खुद बचाओ
ये बाँध लो गाँठ
प्रकृति की न करो अवहेलना
कोई उसे न झेल पाएगा
सूर्य चंद्र वृक्ष मेघ
प्रकृति के सूचना-चालक
इनका संकेत न ठुकराओ
प्रकृति का दिया न बुझाओ
प्रकृति का दिया
कभी न बुझे
कोई उसकी दुर्गति न करो
प्रकृति का विरोध न करो
प्राण, श्वास, न उदर-भरण
कुछ नहीं रह पाएगा
अगर प्रकृति का दिया बुझ जाएगा