जागो लाल

कविता — सोहन सानप

ओ लाल हमारे जाग जियौ रे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।
भास्कर तेज बरस रे,
प्रातःकाल होत उठी जाए।

ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।
खात-कुदत सुखी रैन का बालगोपाल,
हमारे मन को भाए।
क्रीड़ा करत मुस्काए,
मेरा जियो भर आए।

ओ लाल हमारे, कृष्ण हमारे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।

मोर मन को भावे,
चांद मुस्काय सो गयो रे।
सूरज प्रखर होये,
जाग जियौ रे माधव,
प्रातःकाल होत उठी जाए रे।

ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।
सुंदर मुस्कानिया छेड़ दो रे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।

मारे मन मोहना, जाग जियौ रे,
जाग लो रे।
घीरोट खाए,
मंद-मंद मुस्कान रे।
जाग कृष्ण हमारे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।

जागो लाल हमारे,
साँवरी सेठ अब उठी जावे,
मोरे मन सों प्रीत भावे,
जागो लाल हमारे।

ओ लाल हमारे उठी जाग जियौ रे,
गुलितकंद तुम्हारे अंग पे सजा दे रे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।

प्रातः समय होत,
क्रीड़ा करत नाचत,
मेरे मन भावे,
मंद मंद मुस्काए,
जागो म्हारे लाल दुलारे,
भास्कर प्रखर देत,
ओ लाल हमारे,
जागो लाल हमारे।

अपने मुख से हाँक दुवारे,
ओ लाल नंदकिशोर, जाग अब म्हारे नटखट लाल रे,
ओ लाल हमारे जाग जियौ रे।

सोहन सानप की और रचनाएँ

सभी रचनाएँ — बोलती कलम