आदमी अपने भीतर कहाँ
कविता — सोहन सानप
आदमी अपने भीतर कहाँ
न जीवन न अर्थ रहा
न अस्तित्व न राह
न उद्देश्य न ध्येय
न भाव न भावना
ढूँढो तो अंजान-सा
न अपना न दूसरे का
सिर्फ सुख भोग ढूँढ रहा
जीवन का अर्थ न रहा
स्वार्थ में खो बैठा
लोभ में खो गया
अंतरात्मा को भूल गया
स्वार्थ के लिए जी रहा
मोह लेके घूम रहा
जीवन अपना व्यर्थ कर रहा
मोह, सुख, लोभ, अभिमान
ढूँढ रहा अपने भीतर
आदमी अपने भीतर कहाँ
ढूँढो तो अंजान-सा
न जीवन न अर्थ रहा
न अस्तित्व न राह
न उद्देश्य न ध्येय
न भाव न भावना
ढूँढो तो अंजान-सा
न अपना न दूसरे का
सिर्फ सुख भोग ढूँढ रहा
जीवन का अर्थ न रहा
स्वार्थ में खो बैठा
लोभ में खो गया
अंतरात्मा को भूल गया
स्वार्थ के लिए जी रहा
मोह लेके घूम रहा
जीवन अपना व्यर्थ कर रहा
मोह, सुख, लोभ, अभिमान
ढूँढ रहा अपने भीतर
आदमी अपने भीतर कहाँ
ढूँढो तो अंजान-सा