लोगों को कहने दो
कविता — प्रिया काम्बोज प्रिया
शीर्षक --लोगों को कहने दो
दुखती रग पर रखते हैं हाथ उन्हें रखने दो
मिले जो दर्द अपनों से अकेला ही सहने दो
एक दूजे के दुःख सुख की परवाह नहीं किसी को
लोग कहते है लोगों को कहने दो
दर्द है अपना खुद को आज़मा होगा
वक्त की धार पर चलना होगा
हिम्मत कर हौसला रख खुद पर
वक्त की चाल को तुझे फिर बदलना होगा
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित रचना
दुखती रग पर रखते हैं हाथ उन्हें रखने दो
मिले जो दर्द अपनों से अकेला ही सहने दो
एक दूजे के दुःख सुख की परवाह नहीं किसी को
लोग कहते है लोगों को कहने दो
दर्द है अपना खुद को आज़मा होगा
वक्त की धार पर चलना होगा
हिम्मत कर हौसला रख खुद पर
वक्त की चाल को तुझे फिर बदलना होगा
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित रचना