तेरे बिन अब रहा नहीं जाता
कविता — प्रिया काम्बोज प्रिया
चाहतीं हूं रोक लूं तेरे बिन अब रहा नहीं जाता,
आंखों में नींद भी हो पर सोया नहीं जाता। रातें बित जाती है करवटें बदलने में,तेरे बगैर घर खाली अच्छा नहीं लगता।
तु जो चला जाता है सरहद पर दिल मेरा बेचैन रहता
,हर आहट पर ये सोच के डर जाती हूं।
फोन की घंटी जब जब बजती तो लगता तुम्हारा होगा, उदास हो जाती हूं जब खबर न तुम्हारी मिलती।
कैसे कहूं कि तेरे बिन अब रहा नहीं जाता,कब आओगे हमेशा यहीं सवाल करती हूं।
कैसे कहूं कि अब तेरे बिन जीया नहीं जाता।।
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित कविता
आंखों में नींद भी हो पर सोया नहीं जाता। रातें बित जाती है करवटें बदलने में,तेरे बगैर घर खाली अच्छा नहीं लगता।
तु जो चला जाता है सरहद पर दिल मेरा बेचैन रहता
,हर आहट पर ये सोच के डर जाती हूं।
फोन की घंटी जब जब बजती तो लगता तुम्हारा होगा, उदास हो जाती हूं जब खबर न तुम्हारी मिलती।
कैसे कहूं कि तेरे बिन अब रहा नहीं जाता,कब आओगे हमेशा यहीं सवाल करती हूं।
कैसे कहूं कि अब तेरे बिन जीया नहीं जाता।।
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित कविता