कागा बोल गया

कविता — प्रिया काम्बोज प्रिया

कांगा बोल गया है छत पर
हां है कोई आने वाला
दे गया वो संदेशा
कोई अपना आने वाला
उड़ जा रे कांगा
मत ना शोर मचा
पिया नहीं हैं घर में
किसी ओर को मत बुला
लाया है संदेशा तू उनका
कहीं वो ही है आने वाले
मुंह तेरे दूं घी शक्कर
ऐसा सच हो जावे
बहुत दिन हो गए उनसे मिले
जबसे गए वो परदेश
ना भेजा कोई खत उन्होंने
ना ही भेजा कोई संदेश
आयेगा पिया भेद वो खोल गया
कांगा बोल गया छत पर
कांगा बोल गया

प्रिया काम्बोज ✍🏻 स्वरचित कविता
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

प्रिया काम्बोज प्रिया की और रचनाएँ

सभी रचनाएँ — बोलती कलम