"हिन्द में -हिन्दी ......"

कविता — आशा अग्रवाल

✓संस्कृत सुता हिन्दी की कथा,
हिन्दी की कथा, हिन्दी की व्यथा
प्रस्फुटित, प्रकीर्णित,विस्तीर्ण होने वाली,
संकुचित,संकीर्ण ,क्षीण हो रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है
कहीं दूर जा के गहन हो रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है ।
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आचार विचार में, दैनिक व्यवहार में,
अपनी जगह इंग्लिश को दे रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है ।
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देश विदेश में, कार्यकारी आदेश में
पल-पल हमको संकेत दे रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है ।
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जाओ भारतियों ,जा के उसको जगाओ,
उसकी गरिमा में फिर से बढ़ाओ,
हिन्दी की ये दासी तुमसे कह रही है
जो कहीं दूर जा के गहन हो रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है।
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विस्तार उसका इतना बढ़ा दो,
परचम उसका फिर से लहरा दो,
जो हमको अपनी आवाज दे रही है
हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है।
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संस्कृत सुता को फिर से जगाओ,
हर भारतीय में ये भाव बनाओ,
समस्या यह प्रतिदिन गंभीर हो रही है
क्यूं हिन्द में भी हिन्दी खो सी रही है।
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हिन्दी में बचपन, हिन्दी में जवानी,
हिन्दी ही रहे, हर हिन्दुस्तानी की निशानी ,
हिन्दी हमें अपनी कहानी कह रही है
क्यूं में भी हिन्दी खो सी रही है ।
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(आशा अग्रवाल, भरतपुर)
१४-०९-२०२६

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