शीर्षक रहित

कविता — आशा अग्रवाल

उसकी प्रभुता
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मन की है कोमल, गहनता भी है
शक्ति भी है, सरलता भी है,
ये सब उसकी प्रभुता ही है।
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चंचल से चरणों से चलती नहीं,
भले बदले दुनिया, बदलती नहीं,
दृढ़ता भी है, ऋजुता भी है,
ये सब उसकी प्रभुता ही है।
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कभी फूल बगिया का बन जाती वो,
सब के संग रह खिल जाती वो,
उससे सब कुछ महकता ही है
ये सब उसकी प्रभुता ही है।
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चंदा सा चेहरा,
बदन भी सुनहरा,
चमकता भी है, दमकता भी है,
ये सब उसकी प्रभुता ही है।
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पल- पल जिसने मुझको संभाला,
हर एक कंटक पल में निकाला,
रिश्ता भी है, फरिश्ता भी है,
ये सब उसकी प्रभुता ही है।
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Asha agrawal, bharatpur

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