इंसान

कविता — सोहन सानप

एक सूरज उदय होता है
वही तो ढल जाता है
एक फूल भी खिलता है
वही तो मुरझाता है
एक शाम हो जाती है
वही तो निकल जाती है
फिर किस बात का घमंड
एक इंसान आता है
दो पल ही रहता है

पैसों का लालच होता है
वही हाथ से निकलता है
दो पल की ज़िंदगी
दो पल में मिटती है
तो फिर किस बात का घमंड है
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
पूरी दुनिया चल रही
एक काग़ज़ के लिए इंसानियत खो गई
ये कहाँ का न्याय है
जो कभी हुआ ही नहीं
ऐसा एहसास हुआ नहीं

क्यों रे इंसान
जानवर भी जी रहा
अपना जीवन बिता रहा
दो पैसों पे मरते हो
झूठी खुशी हज़म करते हो
ये वक़्त का भी भरोसा नहीं
पैसा आज है कल नहीं
ये तुम्हें समझ है पर
इंसान आज है कल का पता नहीं
तो किस तरह से ही रहे
जिसका कोई अर्थ नहीं

हाय अब इंसानियत घुटने टेक रही
मानवता की लहर आज तो बंद हुई
स्वार्थ से खुश स्वार्थ में जी रहे हो
दुःख तो तुम्हें पता नहीं
खुशियों के काफ़िलों में बड़ा मज़ा आता है
हराम का खाना कैसे हज़म होता है

स्वार्थ भी लालची कपट तुम्हें आता है
इंसान को इंसान कहने से डर लगता है
हाय रब्बा क्या हुआ क्यों हुआ पता नहीं
जीवन का तो कोई मूल्य नहीं मूल्य नहीं
दो पल के लिए शरीर भी बदलते
मेकअप-वेकअप करके खुश हो रहते
हाय रब्बा क्या कैसे क्यों हुआ पता नहीं
धूर्त को मेकअप कर मानवता दिखा दी
अपनी सोच तुमने जूते से नीचे कर दी

हाय राम क्या हो क्या जाने
इस इंसान का फिर बंदर हो ये तो हम भी न जाने

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