शिव व. शक्ति के नौ स्वरूप का दर्शन!
कविता — संदीप शर्मा ‘सरल’
शिव और शक्ति का दर्शन केवल धार्मिक महत्व का ही नही है अपितु यह सृजन सृष्टिकाल चेतना और प्रकृति के गहन व गूढ़तम रहस्य लिए समझाने के लिए भी है!जो अपने-साथ वैज्ञानिक व दार्शनिक पक्ष को समझाता है !इसके कई सिध्दांत हमे हमारे सनातन शास्त्र की और मुडने की और प्रेरित करते है और जब हम इसके विभिन्न विशिष्ट आयामो के अंतर्गत सोचते है तो यह हमे चकित करता है कि वास्तविक सृजन के सौंदर्य की अवधारणा है क्या!?!
अब जैसे शिव और शक्ति की ही परिकल्पना को समझना हो तो शिव को शून्य अर्थात सृजन के उस काल से जोड़ते है जो काल से भी परे है!अर्थात वो स्टेज जिसे existence की अर्थात सत्ता की प्रकटीकरण अभी नही हुआ! या dark matter जैसी stage जैसा !या उस खालीपन को लिए भी कह सकते है जिसमे अभी दृश्य को देखने के लिए कुछ भी नही है!और वो जो दृश्य है कब दृश्यमान होगा जब कोई ऊर्जावान शक्ति इस पदार्थ को जो अदृश्य है को ऊर्जावान करे और वह ऊर्जा शक्ति अर्थात प्रकृति है!तो शिव जहां चेतना शक्ति हुई वही शक्ति या माँ शिवा प्रकृतिक ऊर्जा का संकेत है! है न अद्भुत और लाजवाब। तो शिव व शक्ति यही दो ऊर्जावान शक्तियाँ है जो दृश्य व दृष्टा होने की प्रथम व अनिवार्य शर्त है! जिसे हम पुरुष का पुरूषार्थ अर्थात चेतन शक्ति व प्रकृति के अर्थात स्त्री अवयव के माध्यम से दो ऊर्जाओं के रूप मे मिलन के रूप मे समझेंगे! और जब एक चेतना रूप लेने को अग्रसर हो प्रकृतिक अवयवो से संलग्न हो रूप धारण करती है तो उसकी भौतिक अवस्था बनती है जिसे अब हम देख समझ व महसूस कर सकते!इस शिव और शक्ति के अर्ध नारीश्वर रूप को भी हम यही इसी लय-ताल व लयबद्ध नटराज के लास्य नृत्य के माध्यम से समझ सकते है !
कोई कह सकता है कि यह अर्ध नारीश्वर का स्वरूप कैसे संभव है कि एक पुरुष स्व से ही स्व से स्त्री को प्रकट कर दे!तो क्या एक पुरुष के संसर्ग से बिटिया पैदा नही होती!यह जैविक प्रकिया को समझाने का एक सरलतम उदाहरण है!यही तो शिव शक्ति के अर्ध नारीश्वर रूप व सृजन को दो शक्तियों के मिलन की अनिवार्य शर्त को समझाने के तर्क है!
आइए अब नवरात्र मे पूजे जाने वाले माता के नौ रूपों के दर्शन को भी इसी सृजन की लयबद्धता को समझे!
तो याद कीजिए माता के यही नौ रूप सौंदर्य को और समझिए कि कैसे यह अपने दर्शन को समझाती नज़र आती है!
वास्तव मे यह वो ऊर्जाएं है जो विभिन्न विशिष्ट स्वरूप व तत्व लिए है जिससे सृष्टिकाल की लयबद्धता क्रमशः आगे बढ़ाती है!और है भी यह क्रमबद्ध तरीके से!
मां का प्रथम स्वरूप है :-
शैलपुत्री:-
पहली ऊर्जा जिसे हम शैलपुत्री कहते है जो सृजन की वो अवस्था है जो किसी भी पदार्थ को स्थिरता व अडिगता प्रदान करती है दृश्य होने को पदार्थ के स्थायित्व की यह शर्त मां की यही ऊर्जा प्रेरित करती है इसीलिए पहली शक्ति को हम मां शैलपुत्री के रूप मे पूजते है!यह पर्वत राज हिमालय की पुत्री अर्थात अर्थात जीवन को स्थायित्व व अडिग ता (आप अहम भी कह सकते है क्योकि यहा किसी आस्तित्व के होने की बात हो रही है तो आस्तित्व होगा तो मैं या मैं पन तो आएगा ही)तो यह तो माता का प्रथम रूप हो गया!
ब्रह्म चारिणी:-
अब जब स्थायित्व आ गया स्थिरता आ गई तो आवश्यकता हुई उस ऊर्जा को अनुशासित करने की तो कौन सी शक्ति किसी स्वरूप को अनुशासित करेगा व कैसे तो उसके लिए दूसरी शक्ति क्रियमाण होती है जिसे माता ब्रह्म चारिणि कहते है जो तप और साधना की शक्ति लिए है तप संधि विच्छेद करे तो त+प वह शक्ति अर्थात ऊर्जा जो तम से प्रकाश की और अग्रसर करे! और किस प्रकिया के लिए तो स्वरूप धारण करने के लिए उसी की साधना को तत्पर यह ऊर्जा अपना कार्य करती है!और यह ऊर्जा इतनी संयमित अनुशासित व सुदृढ है कि कब क्या कैसे विकास करना है कि समझ स्व से स्व की विकसित करती है!और इसी निरंतर अभ्यास की शक्ति माता के यह दूसरे स्वरूप की अहमियत को समझाता है
चंद्र घंटा :-
माता की ऊर्जा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्र घंटा है!जो चंद्र की सी मन की चंचलता की घोतक है अब क्योकि सृजन की प्रकिया हो रही है जीवन स्वरूप धारण कर रहा है कुछ शक्तियों या अवयवो का संग्रह या संगम हौ रहा है तो मैं पन भी जागरूक हो गया है इसलिए स्वाभाविक ही है कि कि चंद्र की चंचलता उत्साहित हो तो माता चंद्र घंटा की ऊर्जा इसी चंचलता को शांत व नियंत्रण मे लाने का काम करती है ताकि जीवन का उद्योग सफ़र सफलतापूर्वक संपन्न हो!यह ऊर्जा इसीलिए शीतलता के लिए भी जानी जाती है !
कुष्मांडा:-
माता की चौथी ऊर्जा या स्वरूप का नाम कूष्मांडा है जो अपनी मंद हँसी के लिए विख्यात है जो यह बताती है कि ब्रह्मांड मे जो अंड की स्थिति है उसकी रचना हो चुकी अब उस प्रकिया की अग्रसर होना है जो सकरात्मक ऊर्जा को संचालित व संचारित करे उसमे इसी मां की स्वरूप की शक्ति का रचनात्मक प्रभाव देखने को आता है!अर्थात जीवन का प्रकाटय हो गया है!
स्कन्ध माता :-
अब बढते है माता के पांचवे स्वरूप के दर्शन की और जो यह समझाता है कि जीवन आकार ले चुका है और चूंकि जीवन आस्तित्व मे आ गया है तो ऐसे मे उसकी देखभाल की आवश्यकता है क्योकि वह आरंभिक अवस्था मे है तो ऐसे मे माता स्कंध माता जो अध्यात्मिक तौर पर शिव व शक्ति के संसर्ग से उत्पन्न कार्तिकेय जी के जन्म के रूप मे भी कहती और बतलाती है और अपनी करूणा वात्सल्य की कर्म शीलता लिए प्रकट होती है और अपनी इस ऊर्जा से जीव का पोषण करती है!देखिए कितना अद्भुत संयोजन व Synchronize way से मां शक्ति के इन स्वरूपों की कहानी समझाती चल रही है और हर अवस्था अगली कड़ी की अनिवार्यता है!यह सृजन की क्रमबद्धता लयबद्धता का अनूठा व वशिष्ठ उदाहरण है जिसे शिव शक्ति के लास्य नृत्य के माध्यम से हमे समझाया गया है!
कात्यायनी :-
अब जब पोषण हो रहा है तो संभव है जीव की चंचलता उसे उसके होने के उद्देश्य से दिग्भ्रमित करे तो इसके लिए माता कात्यायनि अपनी ऊर्जा संचारित कर न्याय व तेज शक्ति से जीव को वीरता निर्भयता व अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले गुणो से भरती है और ब्रह्माण्ड से ही उत्पन्न ऊर्जा को ब्रह्माण्डीय शक्ति के लिए कार्यरत रहने को प्रेरित करती है! यही माता के छठे स्वरूप के महत्व की शक्ति को समझाती ऊर्जा की छठी शक्ति का रूप है !
कालरात्रि :-
माता का सांतवा स्वरूप माता कालरात्रि का है और देखिए यह ऊर्जावान ताकत कैसे जीव के भय और अज्ञात अज्ञान का अंत करने को प्रस्तुत है!और यह भीतर के अभिमान अर्थात मैं पन को समाप्त करने की ऊर्जा देती है !ताकि जीव पुनर्पि जन्मं पुनअर्पि मरणं के चक्कर से निजात पा सके किन्तु यह जीव के जीवन की सबसे कठिनतम समस्या है जिसे हटाने का कार्य माता की यह शक्ति करती है!यह अहम के उस विस्तार को समाप्त करने की शक्ति प्रदान करती है ताकि जीव निर्मल रहे चूँकि यह भाव आसानी से जाने वाला नही होता तो मां को रौद्र रूप अख्तियार करना पड़ता है!और जीव की यह कठिनतम परीक्षा मे कोई कोई जीव ही इसमे सफल हो पाता है अन्यथा जन्म मृत्यु के खेल मे ही उसका खेल आरंभ हो जाता!यह ठीक उस रोबोट की तरह है जो स्वचालित है और सोफ्टवेयर बिगड जाने से अनियंत्रित हो गया है और स्व के गलत निर्णय उसे ही नुकसान पहुंचा रहे है!
महागौरी:-
अब हम माता के आठवें स्वरूप को समझते है जो महा गौरी का है जो हमे उस ऊर्जा से मिलवाता है जो हमे यानि जीव को पवित्र और निर्मल कर जीवन के उद्देश्य के सफल आयोजन को सार्थक कर उसके आस्तित्व की उच्चता को प्राप्त कराता है !इसे हम मोक्ष की उपलब्धता की स्थिति से मिलवाने वाली ऊर्जा के रूप मे भी देख सकते है !
यही है वो गौर वर्ण की स्थिति या शक्ति जिसे हम महागौरी कहते है!
सिद्धिदात्री :-
माता का नौवां और अंतिम स्वरूप माता सिद्धिदात्री का है जो जीव के जीवन को निर्मल शुद्ध शुचिता से उपकार की और ले जाने वाली ऊर्जा को उत्साहित व संचारित करने वाली अंतिम शक्ति का दर्शन है !जहा आप देखेगे कि जीव अपने होने या आस्तित्व के आने के बाद अपनी पूर्णता को पाते हुए दिख रहा है और यही विभिन्न ऊर्जाएं अपनी अपनी शक्ति से जीव के सृजन होने से उसकी लय की सार्थक यात्रा का अनुमोदन करती है !
यही वो नौ शक्तियां है जो ऊर्जा के विभिन्न रूपों के माध्यम से मां की पूजा करने को उन्हे धन्यवाद देने को हमे उत्साहित करती है!इसीलिए हम नतमस्तक होते है और प्रयास करते है कि जीव होने के नाते इन विभिन्न उर्जाओं को स्व मे संचारित करे!
बोलिए जय माता दी!
जयश्रीकृष्ण!
=/=
विश्लेषक
संदीप शर्मा सरल !
देहरादून उत्तराखंड !
अब जैसे शिव और शक्ति की ही परिकल्पना को समझना हो तो शिव को शून्य अर्थात सृजन के उस काल से जोड़ते है जो काल से भी परे है!अर्थात वो स्टेज जिसे existence की अर्थात सत्ता की प्रकटीकरण अभी नही हुआ! या dark matter जैसी stage जैसा !या उस खालीपन को लिए भी कह सकते है जिसमे अभी दृश्य को देखने के लिए कुछ भी नही है!और वो जो दृश्य है कब दृश्यमान होगा जब कोई ऊर्जावान शक्ति इस पदार्थ को जो अदृश्य है को ऊर्जावान करे और वह ऊर्जा शक्ति अर्थात प्रकृति है!तो शिव जहां चेतना शक्ति हुई वही शक्ति या माँ शिवा प्रकृतिक ऊर्जा का संकेत है! है न अद्भुत और लाजवाब। तो शिव व शक्ति यही दो ऊर्जावान शक्तियाँ है जो दृश्य व दृष्टा होने की प्रथम व अनिवार्य शर्त है! जिसे हम पुरुष का पुरूषार्थ अर्थात चेतन शक्ति व प्रकृति के अर्थात स्त्री अवयव के माध्यम से दो ऊर्जाओं के रूप मे मिलन के रूप मे समझेंगे! और जब एक चेतना रूप लेने को अग्रसर हो प्रकृतिक अवयवो से संलग्न हो रूप धारण करती है तो उसकी भौतिक अवस्था बनती है जिसे अब हम देख समझ व महसूस कर सकते!इस शिव और शक्ति के अर्ध नारीश्वर रूप को भी हम यही इसी लय-ताल व लयबद्ध नटराज के लास्य नृत्य के माध्यम से समझ सकते है !
कोई कह सकता है कि यह अर्ध नारीश्वर का स्वरूप कैसे संभव है कि एक पुरुष स्व से ही स्व से स्त्री को प्रकट कर दे!तो क्या एक पुरुष के संसर्ग से बिटिया पैदा नही होती!यह जैविक प्रकिया को समझाने का एक सरलतम उदाहरण है!यही तो शिव शक्ति के अर्ध नारीश्वर रूप व सृजन को दो शक्तियों के मिलन की अनिवार्य शर्त को समझाने के तर्क है!
आइए अब नवरात्र मे पूजे जाने वाले माता के नौ रूपों के दर्शन को भी इसी सृजन की लयबद्धता को समझे!
तो याद कीजिए माता के यही नौ रूप सौंदर्य को और समझिए कि कैसे यह अपने दर्शन को समझाती नज़र आती है!
वास्तव मे यह वो ऊर्जाएं है जो विभिन्न विशिष्ट स्वरूप व तत्व लिए है जिससे सृष्टिकाल की लयबद्धता क्रमशः आगे बढ़ाती है!और है भी यह क्रमबद्ध तरीके से!
मां का प्रथम स्वरूप है :-
शैलपुत्री:-
पहली ऊर्जा जिसे हम शैलपुत्री कहते है जो सृजन की वो अवस्था है जो किसी भी पदार्थ को स्थिरता व अडिगता प्रदान करती है दृश्य होने को पदार्थ के स्थायित्व की यह शर्त मां की यही ऊर्जा प्रेरित करती है इसीलिए पहली शक्ति को हम मां शैलपुत्री के रूप मे पूजते है!यह पर्वत राज हिमालय की पुत्री अर्थात अर्थात जीवन को स्थायित्व व अडिग ता (आप अहम भी कह सकते है क्योकि यहा किसी आस्तित्व के होने की बात हो रही है तो आस्तित्व होगा तो मैं या मैं पन तो आएगा ही)तो यह तो माता का प्रथम रूप हो गया!
ब्रह्म चारिणी:-
अब जब स्थायित्व आ गया स्थिरता आ गई तो आवश्यकता हुई उस ऊर्जा को अनुशासित करने की तो कौन सी शक्ति किसी स्वरूप को अनुशासित करेगा व कैसे तो उसके लिए दूसरी शक्ति क्रियमाण होती है जिसे माता ब्रह्म चारिणि कहते है जो तप और साधना की शक्ति लिए है तप संधि विच्छेद करे तो त+प वह शक्ति अर्थात ऊर्जा जो तम से प्रकाश की और अग्रसर करे! और किस प्रकिया के लिए तो स्वरूप धारण करने के लिए उसी की साधना को तत्पर यह ऊर्जा अपना कार्य करती है!और यह ऊर्जा इतनी संयमित अनुशासित व सुदृढ है कि कब क्या कैसे विकास करना है कि समझ स्व से स्व की विकसित करती है!और इसी निरंतर अभ्यास की शक्ति माता के यह दूसरे स्वरूप की अहमियत को समझाता है
चंद्र घंटा :-
माता की ऊर्जा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्र घंटा है!जो चंद्र की सी मन की चंचलता की घोतक है अब क्योकि सृजन की प्रकिया हो रही है जीवन स्वरूप धारण कर रहा है कुछ शक्तियों या अवयवो का संग्रह या संगम हौ रहा है तो मैं पन भी जागरूक हो गया है इसलिए स्वाभाविक ही है कि कि चंद्र की चंचलता उत्साहित हो तो माता चंद्र घंटा की ऊर्जा इसी चंचलता को शांत व नियंत्रण मे लाने का काम करती है ताकि जीवन का उद्योग सफ़र सफलतापूर्वक संपन्न हो!यह ऊर्जा इसीलिए शीतलता के लिए भी जानी जाती है !
कुष्मांडा:-
माता की चौथी ऊर्जा या स्वरूप का नाम कूष्मांडा है जो अपनी मंद हँसी के लिए विख्यात है जो यह बताती है कि ब्रह्मांड मे जो अंड की स्थिति है उसकी रचना हो चुकी अब उस प्रकिया की अग्रसर होना है जो सकरात्मक ऊर्जा को संचालित व संचारित करे उसमे इसी मां की स्वरूप की शक्ति का रचनात्मक प्रभाव देखने को आता है!अर्थात जीवन का प्रकाटय हो गया है!
स्कन्ध माता :-
अब बढते है माता के पांचवे स्वरूप के दर्शन की और जो यह समझाता है कि जीवन आकार ले चुका है और चूंकि जीवन आस्तित्व मे आ गया है तो ऐसे मे उसकी देखभाल की आवश्यकता है क्योकि वह आरंभिक अवस्था मे है तो ऐसे मे माता स्कंध माता जो अध्यात्मिक तौर पर शिव व शक्ति के संसर्ग से उत्पन्न कार्तिकेय जी के जन्म के रूप मे भी कहती और बतलाती है और अपनी करूणा वात्सल्य की कर्म शीलता लिए प्रकट होती है और अपनी इस ऊर्जा से जीव का पोषण करती है!देखिए कितना अद्भुत संयोजन व Synchronize way से मां शक्ति के इन स्वरूपों की कहानी समझाती चल रही है और हर अवस्था अगली कड़ी की अनिवार्यता है!यह सृजन की क्रमबद्धता लयबद्धता का अनूठा व वशिष्ठ उदाहरण है जिसे शिव शक्ति के लास्य नृत्य के माध्यम से हमे समझाया गया है!
कात्यायनी :-
अब जब पोषण हो रहा है तो संभव है जीव की चंचलता उसे उसके होने के उद्देश्य से दिग्भ्रमित करे तो इसके लिए माता कात्यायनि अपनी ऊर्जा संचारित कर न्याय व तेज शक्ति से जीव को वीरता निर्भयता व अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले गुणो से भरती है और ब्रह्माण्ड से ही उत्पन्न ऊर्जा को ब्रह्माण्डीय शक्ति के लिए कार्यरत रहने को प्रेरित करती है! यही माता के छठे स्वरूप के महत्व की शक्ति को समझाती ऊर्जा की छठी शक्ति का रूप है !
कालरात्रि :-
माता का सांतवा स्वरूप माता कालरात्रि का है और देखिए यह ऊर्जावान ताकत कैसे जीव के भय और अज्ञात अज्ञान का अंत करने को प्रस्तुत है!और यह भीतर के अभिमान अर्थात मैं पन को समाप्त करने की ऊर्जा देती है !ताकि जीव पुनर्पि जन्मं पुनअर्पि मरणं के चक्कर से निजात पा सके किन्तु यह जीव के जीवन की सबसे कठिनतम समस्या है जिसे हटाने का कार्य माता की यह शक्ति करती है!यह अहम के उस विस्तार को समाप्त करने की शक्ति प्रदान करती है ताकि जीव निर्मल रहे चूँकि यह भाव आसानी से जाने वाला नही होता तो मां को रौद्र रूप अख्तियार करना पड़ता है!और जीव की यह कठिनतम परीक्षा मे कोई कोई जीव ही इसमे सफल हो पाता है अन्यथा जन्म मृत्यु के खेल मे ही उसका खेल आरंभ हो जाता!यह ठीक उस रोबोट की तरह है जो स्वचालित है और सोफ्टवेयर बिगड जाने से अनियंत्रित हो गया है और स्व के गलत निर्णय उसे ही नुकसान पहुंचा रहे है!
महागौरी:-
अब हम माता के आठवें स्वरूप को समझते है जो महा गौरी का है जो हमे उस ऊर्जा से मिलवाता है जो हमे यानि जीव को पवित्र और निर्मल कर जीवन के उद्देश्य के सफल आयोजन को सार्थक कर उसके आस्तित्व की उच्चता को प्राप्त कराता है !इसे हम मोक्ष की उपलब्धता की स्थिति से मिलवाने वाली ऊर्जा के रूप मे भी देख सकते है !
यही है वो गौर वर्ण की स्थिति या शक्ति जिसे हम महागौरी कहते है!
सिद्धिदात्री :-
माता का नौवां और अंतिम स्वरूप माता सिद्धिदात्री का है जो जीव के जीवन को निर्मल शुद्ध शुचिता से उपकार की और ले जाने वाली ऊर्जा को उत्साहित व संचारित करने वाली अंतिम शक्ति का दर्शन है !जहा आप देखेगे कि जीव अपने होने या आस्तित्व के आने के बाद अपनी पूर्णता को पाते हुए दिख रहा है और यही विभिन्न ऊर्जाएं अपनी अपनी शक्ति से जीव के सृजन होने से उसकी लय की सार्थक यात्रा का अनुमोदन करती है !
यही वो नौ शक्तियां है जो ऊर्जा के विभिन्न रूपों के माध्यम से मां की पूजा करने को उन्हे धन्यवाद देने को हमे उत्साहित करती है!इसीलिए हम नतमस्तक होते है और प्रयास करते है कि जीव होने के नाते इन विभिन्न उर्जाओं को स्व मे संचारित करे!
बोलिए जय माता दी!
जयश्रीकृष्ण!
=/=
विश्लेषक
संदीप शर्मा सरल !
देहरादून उत्तराखंड !