विरहातुर मन

कविता — BEERAM SINGH

मन व्यथा को सदा , अब पवन से कहे l
दिल मेरा दुःख की लहरों की तड़पन सहे l
आँखों के पानी तट पे. , बैठा ये मन ,
फिर ना जाने. , इसी में क्यों डूबा रहे l

ताल यारों का ये सूखा सूखा लगे l
दुःख विरह का सदा मन में पलता रहे l
प्रीति का ये पतंगा. , तो रोदन करे,
ये विरह अग्नि में नित ही जलता रहे l

मन की व्याकुलता में बंशी भी सो गयी l
मन की बैचेनी में , चेतना खो गयी l
तुझसे मिलने की आशा ना पूरी हुई,
अब तो आशा को विरहन की लत हो गयी l

वृक्ष पीड़ा का विरहन में बढ़ता सदा l
मन मरूभूमि में प्रेम गढता सदा l
पीर विरहन की कब तक सहूँगा प्रिये,
तुझसे मिलने को मन मुझसे ल़डता सदा l

ये विरह वेदना, मेरी आदत है अब l
तुझको खोना ही मेरी शहादत है अब l
मन के सपने सभी मन में ही रह गए,
याद तुमको ही करना इबादत है अब l

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