मरीचिका

कविता — दीपराज सिंह

धूप के बीच एक नदी सी दिखाई देती रही,
प्यास की आँखों में उम्मीद मुस्कुराती रही।
हम बढ़े उस ओर, जहाँ पानी का आभास था,
पास पहुँचे तो केवल रेत का निवास था।

दूर से हर सपना कितना सरल लगता है,
पास आकर वही सपना बदलता लगता है।
मन भी अजब यात्री है, रुकना नहीं जानता,
मरीचिका को सच समझकर लौटना नहीं मानता।

कभी सुख की तलाश में उम्र बीत जाती है,
कभी छाया भी धूप बनकर सामने आती है।
जिसे पाने को हमने अपना सब कुछ वार दिया,
वक्त ने हँसकर कहा वह तो भ्रम था, हार दिया।

नदी आँखों में थी, धरती पर नहीं,
प्यास भीतर थी, पानी कहीं नहीं।
हमने रेगिस्तान को दोषी मान लिया,
अपनी आँखों का भ्रम पहचान लिया।

अब दूर चमकता जल भी बुलाता नहीं,
मन हर चमक को सच मानता नहीं।
मरीचिका ने आखिर इतना तो सिखाया,
हर दिखाई देने वाला सत्य नहीं होता,
और हर न मिल पाने वाला स्वप्न असत्य नहीं होता!!

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