दो तत्व
कविता — दीपराज सिंह
दो तत्व मिले तो हमेशा
एक जैसा परिणाम नहीं होता,
कुछ मिलकर जीवन बनाते हैं,
कुछ मिलकर विष भी होता।
किसी अभिक्रिया के लिए
तापमान बदलना पड़ता है,
कभी उत्प्रेरक की थोड़ी-सी मात्रा
पूरा रास्ता बदल देती है।
मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है,
संगत उसका रसायन है,
एक व्यक्ति भीतर आग लगाए,
एक बने शीतल सावन है।
कभी कोई शब्द उत्प्रेरक बनकर
रुकी हुई गति बढ़ा देता है,
कभी एक गलत संगत
पूरे स्वभाव को बदल देता है।
इसलिए हर किसी से मिलना
सिर्फ़ मिलना नहीं होता,
कुछ लोग जीवन में आते हैं
और हमारा रासायनिक सूत्र बदल देते हैं!!
एक जैसा परिणाम नहीं होता,
कुछ मिलकर जीवन बनाते हैं,
कुछ मिलकर विष भी होता।
किसी अभिक्रिया के लिए
तापमान बदलना पड़ता है,
कभी उत्प्रेरक की थोड़ी-सी मात्रा
पूरा रास्ता बदल देती है।
मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है,
संगत उसका रसायन है,
एक व्यक्ति भीतर आग लगाए,
एक बने शीतल सावन है।
कभी कोई शब्द उत्प्रेरक बनकर
रुकी हुई गति बढ़ा देता है,
कभी एक गलत संगत
पूरे स्वभाव को बदल देता है।
इसलिए हर किसी से मिलना
सिर्फ़ मिलना नहीं होता,
कुछ लोग जीवन में आते हैं
और हमारा रासायनिक सूत्र बदल देते हैं!!