पुरानी दीवारें

कविता — महेन्द्र तिवारी

पुरानी दीवारें अब भी कुछ कहती हैं,
बीते कल की यादें जो इनमें रहती हैं।

दरारों में छिपे हैं कितने अफसाने,
कुछ अपने, कुछ बेगाने, कुछ पुराने।

इन पर लिखे बचपन के निशान हैं,
इनमें गूंजते हमारे हँसी के अरमान हैं।

कभी इन्हीं से आँगन महका करता था,
हर कोना कभी अपना-सा लगता था।

माँ की पुकार, पिता की डाँट सुनाई देती,
त्योहारों में हर देहरी जगमगाती रहती।

समय बदला, घर बदले, लोग बदल गए,
कितने ही रिश्ते चुपचाप बिछड़ गए।

फिर भी दीवारें खड़ी हैं मौन बनकर,
इतिहास सँजोए अपने सीने में भरकर।

ढह जाएँगी एक दिन ये पुरानी दीवारें,
पर जीवित रहेंगी इनसे जुड़ी यादें सारी।

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