नवरात्र की महिमा
ग़ज़ल — महेन्द्र तिवारी
हर एक आँगन में देखो कैसी रौनक छाई है,
दिलों को पावन करने फिर से नवरात्रि आई है।
सजे हैं भव्य पंडाल, लाल चुनरी माँ को भाई है,
भजन की गूँज ने फिर से नई उमंग जगाई है।
अँधेरा दूर करने को और मिटाने पाप धरती से,
भवानी ने असुर को मार कर महिमा दिखाई है।
जले हैं दीप नौ दिन, नौ ही रातों का ये मेला है,
सभी ने भक्ति के गीतों पे क्या संगत मिलाई है।
टेक दो माथा खुशी से तुम अम्बे के चरणों में,
उन्ही की ही कृपा से हर खुशी घर में आई है।
दिलों को पावन करने फिर से नवरात्रि आई है।
सजे हैं भव्य पंडाल, लाल चुनरी माँ को भाई है,
भजन की गूँज ने फिर से नई उमंग जगाई है।
अँधेरा दूर करने को और मिटाने पाप धरती से,
भवानी ने असुर को मार कर महिमा दिखाई है।
जले हैं दीप नौ दिन, नौ ही रातों का ये मेला है,
सभी ने भक्ति के गीतों पे क्या संगत मिलाई है।
टेक दो माथा खुशी से तुम अम्बे के चरणों में,
उन्ही की ही कृपा से हर खुशी घर में आई है।