हाल दिल का
कविता — पुष्पा पाठक
हाल दिल का सुनाना ना आया हमें
लब खुले ही नहीं क्या बताऊं तुम्हें,
मेरे जीवन की खुशियों के आधार तुम
बात इतनी सी है क्या बताऊं तुम्हें।
तेरी यादों में हमनें हर इक पल जिया
संग तेरे हर इक दिन सपन सा किया
तुमने खामोशियों को पढ़ा ही नहीं,
दर्द फिर भी अजब सा हमें दे दिया।
तेरी बातें मेरे दिल को चुभतीं रहीं
रात तन्हाइयों में ही कटती रही,
अश्क आंखों की कोरों से ढलका किए
होके बेसुध मैं तकिये भिगोती रही।
तेरे बिन ये जहाँ सूना-सूना लगे,
हर खुशी भी हमेशा अधूरी लगे,
मैंने हर मोड़ पर नाम तेरा लिया,
तू इबादत सा अब तो ज़रूरी लगे।
स्वरचित, मौलिक , अप्रकाशित
*पुष्पा पाठक*,
*छतरपुर, मध्य प्रदेश*
लब खुले ही नहीं क्या बताऊं तुम्हें,
मेरे जीवन की खुशियों के आधार तुम
बात इतनी सी है क्या बताऊं तुम्हें।
तेरी यादों में हमनें हर इक पल जिया
संग तेरे हर इक दिन सपन सा किया
तुमने खामोशियों को पढ़ा ही नहीं,
दर्द फिर भी अजब सा हमें दे दिया।
तेरी बातें मेरे दिल को चुभतीं रहीं
रात तन्हाइयों में ही कटती रही,
अश्क आंखों की कोरों से ढलका किए
होके बेसुध मैं तकिये भिगोती रही।
तेरे बिन ये जहाँ सूना-सूना लगे,
हर खुशी भी हमेशा अधूरी लगे,
मैंने हर मोड़ पर नाम तेरा लिया,
तू इबादत सा अब तो ज़रूरी लगे।
स्वरचित, मौलिक , अप्रकाशित
*पुष्पा पाठक*,
*छतरपुर, मध्य प्रदेश*