शिव स्तुति
कविता — वृंदा ‘वाणी’
कलरव करती कल-कल गंगा, कष्ट कलेश मिटाती है,
गरल गटक कर गंगाधर की, गाथा जग गुंजाती है।
जटा जूट में जल की धारा, धक-धक धौम्य धधकती है,
तरल तरल तन तरल तरंगें, तड़ित वेग से बहती हैं।
भय भंजन भव भूति भूषण, भस्म अंग लिपटाते हैं,
डम-डम डमरू डमका कर वो, डर को दूर भगाते हैं।
शंकर शुभकर शशिधर शेखर, शांति पुंज कहलाते हैं,
विषधर विकृत विश्वरूप ले, विपदा वेग मिटाते हैं।
महा मँगला महा मनोहर, महाकाल मद मर्दन हैं,
शरण शरण में शंकर शिव हैं, शत्रु दल का कर्दन हैं।
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गरल गटक कर गंगाधर की, गाथा जग गुंजाती है।
जटा जूट में जल की धारा, धक-धक धौम्य धधकती है,
तरल तरल तन तरल तरंगें, तड़ित वेग से बहती हैं।
भय भंजन भव भूति भूषण, भस्म अंग लिपटाते हैं,
डम-डम डमरू डमका कर वो, डर को दूर भगाते हैं।
शंकर शुभकर शशिधर शेखर, शांति पुंज कहलाते हैं,
विषधर विकृत विश्वरूप ले, विपदा वेग मिटाते हैं।
महा मँगला महा मनोहर, महाकाल मद मर्दन हैं,
शरण शरण में शंकर शिव हैं, शत्रु दल का कर्दन हैं।
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