अजीब मनुष्य !
कविता — मिस लेखिका
उसने थाली में रोटी आधी छोड़ दी
खैर रोजाना की तरह फेंक आया
आते ही पढ़ने बैठा समाचार पत्र
ये क्या अफ्रीका में भुखमरी की खबर?
खा रहे लोग वहां के अपने जानवरों को?
छी….
यहीं सब सुन अब खाने का मन नहीं है
तो इसीलिए आधा टुकड़ा रोटी थाली में छोड़ आया।
आगे पढ़ खबर भृकुटियां तन सी गई उसकी
ये अजीब मनुष्य
त्रासदी लाकर अब भी उसकी जिम्मेदारी नहीं लेते,
एसी की ठंड में बैठकर, बात प्रकृति की करते
पेड़ काटे, पहाड़ तोड़े, नदी को बोतल में बंद किया,
फिर पूछते हैं - "बादल क्यों नहीं बरसते?"
निदाघ से तपते
मेघ की राह ताकते
क्या अब भी कुछ बचा है बताने को
धरती माँग रही बस एक मौका,
कि पेड़ लगा दो, पानी बचा लो।
पर इंसान अब भी बहाने गढ़ता है,
"मैं अकेला क्या कर लूँगा?" कहकर सो जाता है।
ख़ैर पानी की किल्लत की खबर पढ़ते हुए
दिखी नदी की तस्वीर - कीचड़ में तड़पती मछलियाँ,
खेत दरारों से चीख रहे थे प्यासे।
वो उबासी लेकर उठा, बोला "चलो सोते हैं",
ए०सी० में दोपहर की अच्छी नींद लेने में,भूल गया
बाहर खुली टोंटी, ख़ैर पानी तो मुफ्त के होते है!
~ मिस लेखिका!
खैर रोजाना की तरह फेंक आया
आते ही पढ़ने बैठा समाचार पत्र
ये क्या अफ्रीका में भुखमरी की खबर?
खा रहे लोग वहां के अपने जानवरों को?
छी….
यहीं सब सुन अब खाने का मन नहीं है
तो इसीलिए आधा टुकड़ा रोटी थाली में छोड़ आया।
आगे पढ़ खबर भृकुटियां तन सी गई उसकी
ये अजीब मनुष्य
त्रासदी लाकर अब भी उसकी जिम्मेदारी नहीं लेते,
एसी की ठंड में बैठकर, बात प्रकृति की करते
पेड़ काटे, पहाड़ तोड़े, नदी को बोतल में बंद किया,
फिर पूछते हैं - "बादल क्यों नहीं बरसते?"
निदाघ से तपते
मेघ की राह ताकते
क्या अब भी कुछ बचा है बताने को
धरती माँग रही बस एक मौका,
कि पेड़ लगा दो, पानी बचा लो।
पर इंसान अब भी बहाने गढ़ता है,
"मैं अकेला क्या कर लूँगा?" कहकर सो जाता है।
ख़ैर पानी की किल्लत की खबर पढ़ते हुए
दिखी नदी की तस्वीर - कीचड़ में तड़पती मछलियाँ,
खेत दरारों से चीख रहे थे प्यासे।
वो उबासी लेकर उठा, बोला "चलो सोते हैं",
ए०सी० में दोपहर की अच्छी नींद लेने में,भूल गया
बाहर खुली टोंटी, ख़ैर पानी तो मुफ्त के होते है!
~ मिस लेखिका!