दो साल, एक ज़िद और बोलती कलम

बोलती कलम टीम · 2026-10-24

सच कहूँ तो बोलती कलम किसी बड़े प्लान से शुरू नहीं हुई थी।

बस एक बात खटकती थी। हमारे आसपास कितने लोग लिखते हैं। कोई ऑफ़िस से लौटकर दो लाइनें जोड़ लेता है, कोई रात को फ़ोन के नोट्स में ग़ज़ल लिखकर सो जाता है, कोई बरसों पुरानी डायरी आज भी अलमारी में संभालकर रखे बैठा है। पर ये सब पढ़ता कौन है? ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार दोस्त, वो भी "वाह, बढ़िया है" कहकर आगे बढ़ जाते हैं।

और दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी हैं जो अच्छी कविता सुनना चाहते हैं, पर रील्स के शोर में उन्हें वो मिलती ही नहीं।

बस, इन्हीं दोनों को मिलाने की ज़िद थी। नाम रखा बोलती कलम, क्योंकि कलम जब तक काग़ज़ पर है, चुप है। सुनी जाए, तभी बोलती है।

पहला कार्यक्रम, जो पूरा नहीं हो पाया

आज मान लेने में कोई शर्म नहीं कि हमारा पहला कार्यक्रम पूरा हो ही नहीं पाया था। एक के बाद एक इतनी दिक्कतें आईं कि बीच में ही रुकना पड़ा। उस दिन लगा था कि शायद ये सब हमारे बस का नहीं।

पर उस अधूरे कार्यक्रम में भी कुछ लोग पूरे मन से साथ खड़े रहे। किसी ने शिकायत नहीं की, किसी ने हाथ नहीं छोड़ा। उल्टा हौसला दिया कि अगली बार और अच्छा होगा। उस पहले कदम पर आपने भरोसा न किया होता, तो दूसरा कदम शायद कभी उठता ही नहीं।

और शुक्रिया उन सभी कवियों, लेखकों और कलाकारों का, जो इन दो सालों में बोलती कलम के मंच पर आए। आप इतने हैं कि सबके नाम लिखने बैठूँ तो ये ब्लॉग कभी ख़त्म ही न हो। पर यक़ीन मानिए, हर वो कविता जो आपने यहाँ सुनाई, हर वो शाम जो आपने हमें दी, सब याद है।

उतना ही बड़ा शुक्रिया उन साथियों को भी, जो कभी मंच पर नहीं आए, पर पर्दे के पीछे हमेशा साथ रहे। किसी ने लिंक शेयर किया, किसी ने हर लाइव में कमेंट किया, किसी ने बस फ़ोन करके पूछ लिया कि "सब ठीक है न?"

मंच पर आने वाले हों या पीछे खड़े रहने वाले, आप सब मिलकर ही बोलती कलम परिवार हैं। ये मंच मेरा नहीं, हम सबका है। बोलती कलम आप लोगों की वजह से ही बोल पा रही है।

दो साल बाद

पीछे देखता हूँ तो हैरानी होती है कि एक अधूरी शुरुआत यहाँ तक कैसे आ गई। YouTube पर कार्यक्रम चलते हैं, Instagram पर कवि साथी जुड़ते हैं, और अब ये वेबसाइट भी है, जहाँ रचनाएँ टिककर रह सकें, स्क्रॉल में खो न जाएँ।

"मन की बात — बोलती कलम के साथ" में रचनाकारों से खुलकर बातें होती हैं, "बोलती कलम पर आपकी आवाज़" में आपकी रचना आपकी ही आवाज़ में आती है। "कवियों का संगम" और "सुरीली साहित्यिक जुगलबंदी" वो शामें हैं जिनका इंतज़ार ख़ुद मुझे रहता है। "बोलती किताबें" और "मनन से मानस" थोड़े ठहरकर सोचने वाले कार्यक्रम हैं।

हाल ही में "शब्दों के सितारे" शुरू किया है, एक काव्य प्रतियोगिता, जिसमें जीत जज नहीं, आप तय करते हैं, अपने कमेंट से। और त्योहारों पर "अनकही कथाएँ", जिसमें हर त्योहार से जुड़ी कोई ऐसी पुरानी कहानी सुनाई जाती है जो शायद आपने दादी-नानी से भी न सुनी हो।

अब एक ई-पत्रिका की तैयारी भी चल रही है, हर महीने एक PDF, जिसे आप आराम से पढ़ सकें और WhatsApp पर आगे भेज सकें।

आप भी जुड़िए

यहाँ बड़ा नाम होना ज़रूरी नहीं। आपने अगर कभी कुछ लिखा है और मन में ये सवाल आया है कि "ये किसी काम का है भी या नहीं", तो भेज दीजिए। हो सकता है वही रचना किसी और के दिल की बात निकले।

और अगर आप लिखते नहीं, बस पढ़ना-सुनना पसंद करते हैं, तो भी आप उतने ही ज़रूरी हैं। YouTube पर Bolatee Kalam देख लीजिए, Instagram पर @bolateekalam से जुड़ जाइए। कोई कविता अच्छी लगे तो किसी एक दोस्त को भेज दीजिए। किसी नए कवि के लिए इससे बड़ा इनाम कुछ नहीं होता।

पहला कार्यक्रम अधूरा रहा था, पर सफ़र अधूरा नहीं रहने देंगे। ये वादा है।

मिलते रहिए, पढ़ते रहिए।

— बोलती कलम

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